by Pawan Kumar Jury at February 18, 2015 at 11:19PM

प्रजा अधीन राजा _____________ 'टी सी पी - प्रजातंत्र की चाबी' .……… सिर्फ तीन लाइन का यह क़ानून भारत में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना करेगा, और देश की राजनीति को हमेशा के लिए बदल कर रख देगा । ======== . भारतीय संविधान ने 1950 में यह स्थापित किया कि, भारत एक गणतंत्रात्मक व्यवस्था है तथा जनमत के आधार पर ही शासन चलाया जाना चाहिए । यहाँ गण से आशय जनता, लोक, अवाम या भारतवर्ष के करोड़ो नागरिक है, तथा तंत्र से आशय वह व्यवस्था है जो कि नागरिको की सम्मति से निर्धारित होती है । 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा' के रचियता अजीम शायर सर अल्लामा इकबाल का मशहूर शेर है : इक मर्दे फिरंगी ने किया हमसे ये राज फाश, हर चन्द कि दाना इसे खोला नहीं करते, जम्हूरियत इक तर्ज़ ए हुकूमत है कि जिसमें, बन्दों को गिना करते है तौला नही करते । अर्थात लोकतंत्र में सही या गलत नहीं बल्कि बहुमत सर्वोपरि होता है । ऐसा तंत्र जिसमें नागरिको के पास शासको के सम्मुख सम्मिलित रूप से अपनी सम्मति, सलाह, शिकायत आदि रखने की प्रक्रिया हो, वही तंत्र लोकतंत्र कहाता है । . क्या भारत में लोकतंत्र है ? इस प्रश्न का सीधा जवाब है, नहीं । क्यों मैं कहता हूँ कि भारत में लोकतंत्र नही है, जबकि अक्सर यह कहा जाता है कि भारत में नागरिको के पास अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार है इसीलिए भारत में लोकतंत्र है ? क्योंकि सिर्फ चुनने का अधिकार लोकतंत्र की स्थापना नही करता । लोकतंत्र मतदान के अधिकार से कहीं अधिक है । "भारत में नागरिक यह तो चुनते है कि शासन कौन चलाएगा, किन्तु यह नही चुन पाते कि वह शासन कैसे चलाएगा" । एक बार मतदान करने के बाद सत्ताधीशो के समक्ष नागरिक अपनी स्पष्ट राय नहीं रख पाते और उन्हें अगले पांच वर्ष तक इन्तजार करना पड़ता है । . समस्या यह है कि वर्तमान प्रणाली में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके माध्यम से करोड़ो नागरिक अपनी आवाज स्पष्ट तथा पारदर्शी तरीके से अपने शासकोके समक्ष सम्मिलित तरीके से रख सके । . मिसाल के लिए भारत में सरकार के कई फैसलों के खिलाफ छोटे छोटे समूहों में देश के विभिन्न क्षेत्रो में विरोध प्रदर्शन होते रहते है किन्तु यह तय करने का कोई तरीका नहीं है कि सरकार के किसी फैसले को कितने नागरिको का समर्थन प्राप्त है । ऐसी किसी प्रक्रिया का अभाव सत्ता को अगले पांच वर्ष तक नागरिको की अवहेलना करने की असीमित शक्ति प्रदान कर देता है । . आइये इसे एक उदाहरण से समझते है : हाल ही में सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया, जिसके अनुसार किसी भूमि को रक्षा, ग्रामीण, औद्योगिक विकास, सड़के तथा रेलवे ट्रेक के प्रयोजन के लिए भूमि मालिको की सहमती के बिना भी अधिगृहित किया जा सकेगा । ज्ञातव्य है कि 2013 में उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के लाखों किसानो ने दिल्ली की और पैदल कूच किया था । विरोध को देखते हुए यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण क़ानून में संशोधन करके यह निर्धारित किया था कि, किसी भूमि के अधिग्रहण के लिए 70-80% भूमि मालिको की सहमती अनिवार्य होगी । यह तथ्य है कि पिछले 10 वर्षो के दौरान लगभग 5 करोड़ किसान अधिग्रहण के चलते अपनी भूमि गँवा चुके है । . अब जबकि मोदी साहेब को विराट बहुमत मिला है, उन्होंने सत्ता में आकर इस क़ानून को संशोधित करके फिर से पलट दिया । वर्तमान व्यवस्था में अब मोदी साहेब को यह छूट है कि वे प्राप्त बहुमत के आधार पर इस तरह के कई फैसले अगले पांच वर्ष तक यह कहते हुए ले सकते है कि, 'जनता हमारे साथ है' । . मान लीजिये कुछ या बहुत से नागरिक इस फैसले का विरोध करते है, लेकिन क्या नागरिको के पास कानूनी रूप से कोई ऐसी विधिवत प्रक्रिया है, जिसके तहत वे अपनी सहमती या असहमति अपने प्रधानमन्त्री के सम्मुख रख सके ?जाहिर है, करोडो मतदाताओं के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है । . ऐसी किसी प्रक्रिया के अभाव में नागरिक विरोध के असंगठित तरीको जैसे कि अनशन, धरने, प्रदर्शन आदि को अपनाने को मजबूर होते है, जिनमे प्रजा की असीमित शक्ति खर्च होती है, जबकि नतीजा सिफर ही रहता है । . यहाँ इस बिंदु पर भी विचार करना आवश्यक है कि अच्छी सरकार भी सभी फैसले अच्छे नहीं करती, ठीक उसी तरह जिस तरह कोई बुरी सरकार सभी फैसले बुरे नही करती । अत: प्रजा के पास ऐसी प्रक्रिया अवश्य होनी चाहिए जिसके माध्यम से प्रजा संगठित रूप से सरकार के किसी फैसले पर अपनी राय या शिकायत स्पष्ट, पारदर्शी और अधिकृत तरीके से रख सके । ऐसी प्रक्रिया आने से जहां एक और प्रजा की भागीदारी शासन में बढ़ेगी वहीँ किसी भी सरकार के लिए भी प्रजा के रुख को समझने में आसानी होगी परिणामस्वरूप सरकार की कार्यकुशलता में वृद्धि होगी । . समाधान : हमें इस बात को समझना बहुत जरुरी है कि, व्यवस्था से सम्बंधित किसी भी समस्या का समाधान क़ानून होते है । देश को क़ानून चलाते है, बयान और नारे नहीं । यदि आप देश की किसी भी समस्या का हल चाहते है, तो आपको उसके कानूनी समाधान में रुचि दिखानी चाहिए । क़ानून में बदलाव से ही वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है । . कानूनी समाधान : इस समस्या के समाधान के लिए हम तीन धाराओं के 'पारदर्शी शिकायत प्रणाली' [ टी सी पी ] क़ानून का प्रस्ताव कर रहे है । यदि इन तीन धाराओं को प्रधानमन्त्री गेजेट में प्रकाशित कर देते है, तो करोड़ो नागरिको को अपनी स्पष्ट एवं अधिकृत आवाज को पारदर्शी तरीके से रखने का मंच मिल जाएगा । ड्राफ्ट का प्रारम्भ : . धारा 1 : 'राष्ट्रपति कलेक्टर को ये आदेश दे कि यदि कोई मतदाता कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर कोई भी शपथपत्र प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डालने का अनुरोध करता है तो कलेक्टर प्रति पृष्ठ 20 रूपये की दर से शुल्क ले कर के उस प्रस्ताव को प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा' । धारा 2 : 'राष्ट्रपति कलेक्टर को ये आदेश दे कि यदि कोई मतदाता पटवारी की कचहरी में उपस्थित होकर किसी शपथपत्र पर हां या नहीं दर्ज करवाता है तो पटवारी मतदाता की हाँ/नहीं दर्ज करके उसे प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा और मतदाता से 3 रुपये ले कर बदले में छपी हुयी रसीद देगा' धारा 3 : "यदि किसी शपथपत्र पर कुल मतदाताओं के 51% मतदाता हाँ दर्ज करवा देते है तो प्रधानमन्त्री उस पर कार्यवाही कर सकते है या उन्हें ऐसा करने की ज़रुरत नही है" बस ये इतना ही है ।आसान शब्दों में कहे तो 'यदि कोई मतदाता अपना कोई प्रस्ताव/सुझाव/शिकायत प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डालना चाहे तो उसे विधिवत शुल्क लेकर ऐसा करने दिया जाएगा' . आइये समझते है कि, सिर्फ तीन लाइन का यह क़ानून किस तरह देश की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन ले आता है । . टीम अन्ना तथा केजरीवाल 2012 से देश में जनलोकपाल क़ानून को पारित करने की मांग कर रहे है किन्तु क्या आप जानते है भारत में कितने नागरिक इस क़ानून का समर्थन करते है ? इस सम्बन्ध में सबके पास अपनी अलग अलग संख्या है । अन्ना तथा केजरीवाल के जनलोकपाल क़ानून पर सबसे अधिक प्रश्न इस बात को लेकर खड़े किये गए कि, यदि लोकपाल ही भ्रष्ट हो जाता है, तो क्या होगा । टीम अन्ना तथा केजरीवाल के पास आज भी इस प्रश्न का जवाब नहीं है । . अब अन्ना जनलोकपाल की मुहीम फिर से छेड़ना चाहते है, किन्तु टी सी पी के अभाव में विधिवत मांग की जगह यह मुहीम फिर से एक तमाशा मात्र बन कर रह जायेगी । अन्ना कहेंगे जनता हमारे साथ है, मोदी साहेब कहेंगे कि बहुमत हमारे पास है, जबकि केजरीवाल का दावा है कि वही एक मात्र व्यक्ति है जो जनलोकपाल के लिए समर्पित है । किन्तु इस सम्बन्ध में जनता के पास अपनी राय रखने का कोई मंच नहीं है । . यदि टी सी पी क़ानून को गेजेट में प्रकाशित कर दिया जाता है, तो अन्ना जनलोकपाल के ड्राफ्ट को प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर दर्ज करा सकेंगे, ताकि जो कोई भी नागरिक उनके द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट का समर्थन करता है, वह पटवारी की कचहरी में जाकर या अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से एसएमएस करके अपनी सहमती दर्ज करा सकता है । . इसके अलावा मान लीजिये कि कोई नागरिक इस क़ानून में यह संशोधन चाहता है कि, लोकपाल की नियुक्ति तथा निष्कासन का फैसला नागरिको के बहुमत से किया जाना चाहिए, तो वह अपने संशोधन का प्रस्ताव भी प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर दर्ज करा सकेगा । प्रस्ताव दृश्य होने के कारण करोड़ो नागरिक इन प्रस्तावों को देख सकेंगे तथा अपनी राय प्रधानमन्त्री के समक्ष संगठित विधि से रख सकेंगे, ताकि प्रधानमन्त्री बहुमत के आधार पर युक्तियुक्त कार्यवाही कर सके । . यह क़ानून लागू होने के बाद अन्ना नागरिको का समर्थन मांगने और अपने प्रस्ताव का प्रचार करने के लिए अनशन, धरना वगेरह करते है तो इन गतिविधियों के मायने होंगे अन्यथा यह अनशन धरने वगेरह फिर से नागरिको और राष्ट्र का समय और ऊर्जा को व्यर्थ ही नष्ट करेंगे । . इस ड्राफ्ट में राष्ट्रपति तथा प्रधानमन्त्री शब्द के स्थान पर क्रमश: राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री शब्द का प्रयोग करके इस क़ानून को राज्य सरकारों के राजपत्र में भी प्रकाशित किया जा सकेगा, ताकि मुख्यमंत्री से सम्बंधित विषयों पर राज्य केनागरिक अपनी राय, शिकायत या प्रस्ताव सीधे राज्य सरकार के समक्ष रख सके । . यह क़ानून अरविन्द केजरीवाल जैसे नेताओं के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगा जो कि ज़्यादातर फैसले जनता से पूछकर करना चाहते है, जैसे कि क्या उन्हें राजनेतिक पार्टी का गठन करना चाहिए या नहीं, अथवा उन्हें कोंग्रेस के समर्थन से सरकार बनानी चाहिए या नही आदि । इसी तरह करोड़ो नागरिक 2012-13 में ही मनमोहन साहेब के नेतृत्व को खारिज कर चुके थे, किन्तु कोंग्रेस जनता की यह आवाज़ समझने में नाकामयाब रही । यदि नागरिको के पास टी सी पी जैसी प्रणाली होती तो नागरिक मनमोहन साहेब के खिलाफ शिकायत पर अपनी हाँ या ना दर्ज करा सकते थे, ऐसा होने से बहुमत का सम्मान करते हुए सोनिया जी मनमोहन साहेब से इस्तीफा मांग कर राहुल गांधी या अन्य किसी वरिष्ठ मंत्री को प्रधानमन्त्री की शपथ दिला सकती थी । इससे जहाँ एक और करोड़ो नागरिको को मनमोहन साहेब के खिलाफ अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए 2 वर्ष तक इंतिजार नहीं करना होता, वहीँ नेतृत्व परिवर्तन करके कोंग्रेस भी इतनी बड़ी हार से खुद को बचा सकती थी । . टी सी पी क़ानून का अन्य मजबूत पहलू यह है कि, यह क़ानून जनता की आवाज को मिलाने का मंच उपलब्ध करवाता है । जबकी सत्ता तथा नेताओं के पास अपनी बात रखने के लिए समाचार पत्रों तथा खबरिया चेनलो का माध्यम मौजूद है, वहीँ करोड़ो नागरिको के पास आपस में समन्वय स्थापित करने तथा संगठित सहमती के साथ अपने शासको के सामने अपनी बात रखने का कोई अधिकृत जरिया नहीं है । टी सी पी इस आवश्यकता को भी पूरा करता है । . उदाहरण के लिए मान लीजिये कि देश के नागरिक छोटे छोटे समूहों में अपने अपने ढंग से गौ हत्या, 80G, 498-A, लगातार बढती स्कूल फ़ीस, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की गुप्तफाइलों को सार्वजनिक करना तथा अन्य ऐसे ही कई मुद्दों के निस्तारण की मांग कर रहे है, किन्तु नागरिको के पास ऐसा कोई मंच नही है जिसके माध्यम से यह तय किया जा सके कि कितने नागरिक किसी मांग का समर्थन करते है । टी सी पी के अभाव में नागरिको के पास छिटपुट समूहों में अनशन, धरने, ज्ञापन, प्रदर्शन, नारेबाजी, रास्ता जाम करना आदि थकाऊ, असभ्य तथा समय और ऊर्जा चूसने वाले विकल्पों को अपनाने के सिवा अन्य कोई रास्ता नहीं है । . टी सी पी क़ानून आने के बाद अमुक संगठन अपनी मांग शपथ पत्र के माध्यम से प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर रख सकेंगे, ताकि वे सोशल मिडिया तथा अन्य माध्यमो से अपनी मांग का प्रचार करके नागरिको से समर्थन मांग सके । . यह क़ानून गेजेट में प्रकाशित होने से आम नागरिक को देश की किसी समस्या पर समाधान प्रस्तुत करने तथा उस पर जनता की राय जानने का भी अवसर मिलेगा । मान लीजिये कि कोई संगठन देश में गरीबी, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा जैसी किसी समस्या के समाधान के लिए क़ानून प्रस्तुत करना चाहता है, तो वह कलेक्टर के कार्यालय में अपने मतदाता पहचान पत्र के साथ उपस्थित होकर प्रस्तावित क़ानून का ड्राफ्ट प्रस्तुत कर सकेगा, यदि करोड़ो नागरिक उस क़ानून पर हाँ दर्ज करते है, तो बहुमत का सम्मान करते हुए प्रधानमन्त्री या मुख्यमंत्री उस क़ानून को पारित कर सकेंगे । . निष्कर्ष यह कि टी सी पी ऐसा निरापद क़ानून है, जो सभी राजनेतिक दलों, सभी संगठनो तथा करोड़ो नागरिको को आपस में समन्वय तथा संचार का मंच उपलब्ध कराता है । टी सी पी के आने से प्रजा की भागीदारी शासन में बढ़ेगी, राजनेतिक दलों तथा समूहों को जनता की स्पष्ट, अधिकृत तथा पारदर्शी राय जानने का अवसर मिलेगा, कार्यकर्ताओं को अनशन, धरने के लिए बार बार सड़क पर उतर कर हुडदंग करने सेछुटकारा मिलेगा तथा सच्चे अर्थो में प्रजातंत्र की स्थापना होगी । . यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो इस क़ानून के बारे में अन्य नागरिको को सूचना दे सकते है, अपने क्षेत्र के सांसद महोदय से मांग कर सकते है कि, इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाए । यदि आप किसी राजनेतिक दल या सामाजिक सांस्कृतिक संगठन से जुड़े हुए है, तो संगठन के पदाधिकारियों से इस क़ानून को अपने एजेंडे में शामिल करने को कह सकते है, ताकि अधिक से अधिक नागरिको तक इस क़ानून की जानकारी पहुंचे । टी सी पी क़ानून के बारे में अधिक जानकारी के लिए गूगल करें या प्रजा अधीन राजा कार्यकर्ताओं से संपर्क करे । . पवन कुमार 'जूरी' ________________ प्रजा अधीन राजा @ pk

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via Bhavik Barai

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