by Pawan Kumar at January 01, 2015 at 01:35AM
कैसे गैर सरकारी संगठन प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष ढंग से देश को नुकसान पहुंचाते है ? _______________ भारत में 33 लाख एनजीओ कार्यरत है । भारत की जनसँख्या से विभाजित करने पर यह अनुपात लगभग प्रति 400 व्यक्तियों पर एक संगठन का ठहरता है । आखिर भारत में इतनी बड़ी तादाद में एनजीओ कर क्या रहे है ? . असल में एनजीओ का इतने बड़े पैमाने पर कार्य करना सरकार की विफलता को दर्शाता है । यदि सरकार किसी कार्य को ठीक ढंग से नही कर पा रही है, तो बजाय सरकार और प्रशासन को ठीक करने के, कार्यकर्ता खुद उस कार्य को करने का बीड़ा उठा लेते है, जिस से सरकार में सुधार करने की संभावनाएं क्षीण हो जाती है । . उदाहरण के लिए मान लीजिये कि देश में वंचित तबके को गेंहू, शक्कर आदि राशन की कमी से जूझना पड़ रहा है, तथा वे ऊँचे दाम चुका कर अपनी भोजन की आवश्यकताओ की पूर्ती करने में अक्षम है । ऐसे में पहला विकल्प यह है कि कोई कार्यकर्ता एक संगठन बनाकर गरीबो को भोजन बांटना शुरू करता है। चूंकि ये मानव सेवा का अच्छा कार्य है, अत: शीघ्र ही सेंकडो हज़ारो संगठन पूरी निष्ठां और इमानदारी से ये कार्य करने लगते है । प्रश्न उठता है कि क्या ये हजारो संगठन इस समस्या को इस तरह हल कर पायेंगे, और कर पायेंगे तो कब तक ? क्योंकि इन्हें लगातार चंदे जुटाने, कार्यालय चलाने और गतिविधियाँ करने के लिए, ढेर सारे समय और शक्ति की आवश्यकता होगी । अलावा इसके कोष/चंदे के अभाव में ये संगठन सूख जायेंगे । . जबकि दूसरा विकल्प यह है कि, कार्यकर्ता सरकार से ऐसा क़ानून पास करने की मांग करते है, ताकि गरीबो को सस्ती दर पर राशन मिले । कार्यकर्ताओं की की मुहीम और बनाए गए दबाव के चलते मान लीजिये कि सरकार 'राशन कार्ड प्रणाली' के क़ानून को गेजेट में छापने को मजबूर हो जाती है । ( जैसा की दशको पहले सरकार ने इस क़ानून को गेजेट में छापा ) . राशन कार्ड सिस्टम लागू होने से सरकार ने हज़ारो उचित मूल्य की दुकाने खोली और करोड़ो नागरिको को एक निश्चित व्यवस्था के तहत सस्ती दर पे राशन मिलने लगा, दशको से मिल रहा है, तथा मिलता रहेगा । . कहानी की सीख यह है कि यदि देश में कोई भी कार्यकर्ता यदि किसी समस्या का स्थाई समाधान चाहता है, तो उसे सरकार से वांछित कानूनों की मांग करनी चाहिए, न कि खुद एक नया संगठन खड़ा करके समस्या को बढ़ाना चाहिए । . कैसे ये संगठन/कार्यकर्ता समस्या को बढ़ाकर राष्ट्र को क्षति पहुंचाते है ? . राजनेतिक दल हमेशा चाहते है कि कार्यकर्ता ज्यादा से ज्यादा मानवतावादी तथा सेवार्थ कार्य करते रहे । ऐसा करने से युवा अपनी शक्ति अस्थाई बदलाव पर खर्च कर देता है, तथा मूल मुद्दों पर कार्य करने हेतु उसके पास समय और उर्जा नही बचती । यदि इस सक्रीय वर्ग की ऊर्जा को बेफिजूल के सेवा आदि कार्यो में नही खपाया गया तो, ये वर्ग राजनीति में रूचि लेगा तथा उनके शासन पर सवाल खड़े करेगा । सेवा कार्यो में लगे रहने से लाखो करोड़ो कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट हो जाता है, तथा देश की न्याय व्यवस्था, अर्थव्यवस्था तथा सेना को मज़बूत करने के लिए आवश्यक कानूनों के प्रचार के लिए कार्यकर्ता नहीं मिल पाते । . इसी पैंतरे का इस्तेमाल अंग्रेजो और मोहन गांधी ने भारत के युवाओं को उलझाने में किया था । अंग्रेजो ने मोहन गांधी को पेड मिडिया के जरिये महात्मा बना दिया, और मोहन ने देश के लाखो करोडो कार्यकर्ताओं को चरखा, खादी, चप्पले, बकरी का दूध, भजन, साफ़ सफाई आदि अनुपयोगी कार्यो में उलझा लिया । इसका दुष्परिणाम यह निकला कि महात्मा भगत सिंह, आज़ाद, सान्याल आदि को कार्यकर्ता नही मिल पाए, और राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस को सेना खड़ी करने के लिए देश से बाहर जाकर कार्यकर्ता ढूँढने पड़े । . अमूमन एनजीओ को आकार की दृष्टी से तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है । बड़े आकार के संगठन - ये सभी संगठन बिके हुए या दबे हुए होते है, और मुख्यतया राजनेतिक प्रश्रय के चलते ही यह अपना आकार बढा पाते है । इनका शीर्ष पूरी तरह बिका हुआ होता है, तथा ये जानबूझकर बड़े पैमाने पर लाखो कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट करते है। यह जानते हुए भी कि, देश में किसी भी प्रकार का बदलाव लाने के लिए क़ानून में बदलाव आवश्यक है, ये संगठन कभी किसी समस्या का कानूनी ड्राफ्ट नही देते, न ही अपने कार्यकर्ताओं को ऐसी जानकारी देते है । मध्यम आकार के संगठन - इनमे बड़े संगठनो के अधीनस्थ, विदेशी चंदो से चलने वाले तथा भारत के धनिको के चंदे पर चलने वाले संगठन शामिल है । ये दबाव समूहों की तरह कार्य करते है, तथा विभिन्न राजनेतिक दलों से ज़्यादातर अंदरखाने या एलानिया सम्बद्ध रहते है । ये संगठन भी अपने कार्यकर्ताओं को कानूनी ड्राफ्ट्स की जानकारी नही देते । . छोटे आकार के संगठन - इनकी तादाद सबसे ज्यादा है, हर शहर में ये सेंकडो की संख्या में बिखरे पड़े है, आप ऐसा एक ढूढेंगे तो आपको ऐसे 100 संगठन मिल जायेंगे । अमूमन ये सभी संगठन भ्रमित होते है, और रक्तदान, गौसेवा, अशक्तजनों की सेवा, शिक्षा आदि मानवता वादी गतिविधियों पर कार्य करते है । इनमें से ज़्यादातर को इस तथ्य की जानकारी ही नहीं होती, कि देश में कोई भी बदलाव लाने के लिए कानूनों की आवश्यकता होती है । अत: भ्रम में पड़े हुए ये समर्पित कार्यकर्ता अपना कीमती समय समस्या के फौरी समाधान पर खपा देते है । ये ज्यादा लम्बे समय तक काम नहीं कर पाते, 2-5 वर्ष जोश में कार्य करते है, और फिर ठन्डे पड़ कर निष्क्रिय हो जाते है । किन्तु इनकी संख्या कम होने के बजाय लगातार बढती रहती है, क्योंकि जिस संख्या में यह बंद होते है, उससे अधिक संख्या में नये खुल जाते है । अमूमन ये संगठन खुदरा इकट्ठे किये गए चंदो पर चलते है । भारत में इस श्रेणी के संगठनो की पूरी फ़ौज मौजूद है, जो अपने अपने तरीके से समस्या को हल करने के चक्कर में समस्या को लगातार बढ़ा रही है । . क्यों मैं कहता हूँ कि ये सभी कार्यकर्ता/संगठन भ्रमित है तथा समस्या को बढ़ा रहे है ? मान लीजिये कि, एक शहर में 25 संगठन शिक्षा के विषय पर कार्य करते है, तथा राज्य में इनकी कुल संख्या 1000 है । ये सभी संगठन अपने अपने तरीके से शिक्षा सुधार के लिए कार्य करते है, किन्तु इस से शिक्षा के स्तर में कोई आमूलचूल परिवर्तन नही आता, क्योंकि ये छोटी छोटी अव्यवस्थित इकाइयों में कार्य करते है, तथा सुदृढ़ एवं स्थायी व्यवस्था का निर्माण करने में अक्षम है । किन्तु यदि ये संगठन शिक्षा सुधार के लिए सरकार से अच्छे क़ानून की मांग करते है, तो अच्छा क़ानून शीघ्र ही सभी संगठनो में लोकप्रिय हो जाएगा तथा सरकार पर विभिन्न क्षेत्रो से कई संगठनो द्वारा अमुक क़ानून को पास करने का दबाव पड़ेगा, अत: जन दबाव के चलते सरकार को क़ानून पास करना पड़ेगा । क़ानून के पास होने से पूरे राज्य में शिक्षा की बदहाल व्यवस्था सुव्यवस्थित हो जायेगी और करोडो व्यक्ति लाभान्वित होंगे । कहानी का फिर से सबक यही है कि यदि आप किसी समस्या का वाकई में स्थाई और व्यवस्थित समाधान चाहते है, तो अच्छे कानूनों का प्रचार करे । . नतीजा : भारत की सेना बेहद कमजोर हो चुकी है, और लगातार कमजोर हो रही है । भारत गले गले तक विदेशी क़र्ज़ में डूबा हुआ है, और डॉलर का बोझ लगातार बढ़ रहा है। 3 करोड़ केस अदालतों में लटके पड़े है, और साधारण मामलो में भी फैसला आने में दशको बीत जाते है। 2 करोड़ बांग्लादेशी घुसपेठिये देश में डेरा जमाये बैठे है, जो की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से कभी भी गंभीर खतरा बन सकते है। नक्सलवाद लगातार अपने पाँव पसार रहा है, हमारे खनिजो को बेतहाशा लूटा जा रहा है, मर्ज़ी हो तब कसाब मुहं उठाये शहरो में घुसे आ रहे है, और हम उधार के हथियारों तथा डॉलर पर देश चला रहे है । इसके अलावा बेरोज़गारी, भुखमरी और भ्रष्टाचार हमारी शाश्वत समस्याएं है । . इन सब गंभीर समस्याओं के निराकरण के लिए हमें ज्यूरी सिस्टम, राईट टू रिकाल प्रक्रिया सभी मुख्य पदों पर, संपत्ति कर, डीडीएमआरसीएम तथा हथियार बंद नागरिक समाज की रचना कानूनों की तत्काल आवश्यकता है । लेकिन इन गंभीर मुद्दों पर झाडू फेरकर लाखो कार्यकर्ता हल्के फुल्के सेवा कार्यो में अपना समय, शक्ति और धन खर्च कर रहे है, जिस से ये समस्याएं लगातार बढ़ रही है । . खतरा : भारत की एतिहासिक पृष्ठभूमि के आलोक में यह निश्चित संभावना है, कि भारत को ज़ल्द ही चीन या अमेरिका से युद्ध लड़ना पड़ेगा । ऐसी स्थिति में भारत डूब जाएगा, और हम फिर से गुलाम हो जायेंगे । . प्रजा अधीन राजा समूह के बारे में : प्रजा अधीन राजा समूह ने देश की लगभग सभी गंभीर समस्याओं के निराकरण के लिए 100 से अधिक कानूनी ड्राफ्ट्स प्रस्तावित किये है, जिन्हें गेजेट में छापने की हम मांग कर रहे है । मुख्य लक्ष्य : भारत की सेना को अमेरिका जितनी ताकतवर बनाना । सूत्र वाक्य : शासन की मशीन कानूनों पर चलती है, अच्छे क़ानून अच्छा देश बनाते है, बुरे क़ानून बुरा । समूह द्वारा प्रस्तावित सभी कानूनों के ड्राफ्ट आप यहाँ से मुफ्त डाउनलोड कर सकते है : rahulmehta .com/301.htm प्रजा अधीन राजा एक अपंजीकृत, असंगठित समूह है, तथा हम सिर्फ अच्छे कानूनों का प्रचार करते है, यदि आपके पास किसी समस्या के समाधान के लिए कानूनी ड्राफ्ट हो, तो हमें प्रेषित करे ।यदि प्रस्तावित क़ानून बेहतर हुआ तो हम उसका भी प्रचार करेंगे । . यदि आप किसी संगठन से जुड़े हुए है, तो अमुक संगठन के पदाधिकारियों से निम्न प्रश्न पूछे : 1. अमुक संगठन किस समस्या पर कार्य कर रहा है ? 2. क्या अमुक संगठन ने समाधान के लिए कोई लिखित कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किये है । यदि संगठन ने कानूनी ड्राफ्ट नहीं दिए है, तो उनसे ड्राफ्ट देने को कहें । यदि वे ड्राफ्ट देने में अक्षम हो, तो प्रजा अधीन राजा के किसी कार्यकर्ता से संपर्क करे । हम आपको आपकी समस्या के अनुसार ड्राफ्ट उपलब्ध करायेंगे, यह ड्राफ्ट आप अपने सगठन को देवें । यदि अमुक संगठन न तो खुद ड्राफ्ट देता है, न ही आपके द्वारा प्रस्तुत ड्राफ्ट को स्वीकार करता है, मिनिट से पहले यह बात समझ लेवें की, अमुक संगठन सिर्फ कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट करने के लिए ही पंजीकृत करवाया गया है, तथा उनकी रूचि समस्या के स्थायी समाधान में नही है । अत: ऐसे संगठन का त्याग वैसे ही कर दे, जिस तरह से विषयुक्त भोजन का कर दिया जाता है । . यदि आप ऐसा कोई संगठन चलाते है, तो समस्या के समाधान के लिए कानूनी ड्राफ्ट अपने एजेंडे में शामिल करे, तथा प्रजा अधीन राजा को भी उपलब्ध कराएं या कानूनी ड्राफ्ट प्रजा अधीन राजा से प्राप्त करे । यदि आपकी रूचि समाधान के कानूनी ड्राफ्ट्स में नही है, तो यह तय है कि आप समस्या को बढ़ावा दे रहे है । ------------------------ प्रजा अधीन राज़ा @ pk
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