by Santosh Arya at January 07, 2015 at 02:53PM

सब कुछ सोचे अनुसार चल रहा है। (World Bank and IMF) कृषि के संदर्भ में राष्ट्रीय नमूना सर्वे संगठन (एनएसएसओ) की हालिया रिपोर्ट साफ तौर पर बताती है कि जैसा अनुमान लगाया जा रहा था, चीजें उसी तरह चल रही हैं। कृषि न केवल भयावह संकट के दौर से गुजर रही है, बल्कि उसका तेजी से क्षरण भी हो रहा है। मैं चकित नहीं हूं। आखिरकार 1996 में ही विश्व बैंक ने भारतीय कृषि के पतन की दिशा बता दी थी। तब विश्व बैंक ने अनुमान लगाया था कि अगले बीस वषरें में यानी 2015 तक भारत में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी इलाकों में पलायन का आंकड़ा ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की साझा आबादी के आंकड़े की बराबरी कर लेगा। इन तीनों देशों की संयुक्त आबादी 20 करोड़ है और विश्व बैंक ने अनुमान लगाया था कि 2015 के अंत तक ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन का आंकड़ा इस संख्या तक पहुंच सकता है। यह भयावह स्थिति केवल इसीलिए उत्पन्न हुई है, क्योंकि कृषि फायदे का व्यवसाय नहीं रह गई है। घाटे की खेती करते-करते किसान ऊब चुके हैं और वे न केवल इसे छोड़ने के लिए विवश हैं, बल्कि रोजी-रोटी की तलाश में शहरी इलाकों का रुख भी कर रहे हैं। 2008 की अपनी विश्व विकास रिपोर्ट में विश्व बैंक ने यह इच्छा प्रकट की थी कि भारत भूमि अधिग्रहण के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं के कौशल विकास के लिए देशव्यापी प्रशिक्षण केंद्र बनाने की प्रक्त्रिया तेज करे ताकि उन्हें औद्योगिक श्रमिक के रूप में तैयार किया जा सके। अब किसानों को कृषि से बाहर निकालने की प्रक्त्रिया कहीं अधिक स्पष्ट रूप से नजर आ रही है। इसके संकेत पिछले 17 वषरें में तीन लाख से अधिक किसानों की आत्महत्या तथा 42 प्रतिशत किसानों द्वारा विकल्प उपलब्ध होने की दशा में कृषि छोड़ने के इच्छुक होने जैसे तथ्यों से भी मिलते हैं। ये तथ्य जिन परिस्थितियों की देन हैं उनमें कृषि को जानबूझकर सार्वजनिक क्षेत्र की फंडिंग से दूर रखने के प्रयास भी शामिल हैं। हालात दिन-प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं। बढ़ती कर्जदारी को समाप्त करने के लिए कोई प्रयास न होना तथा करीब 58 प्रतिशत किसानों के रोज ही भूखे सोने के तथ्य भी यह बताते हैं कि किसान पलायन के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। 2011 की जनगणना बताती है कि रोज 2400 से अधिक किसान कृषि छोड़कर शहरों की ओर चल पड़ते हैं। कुछ स्वतंत्र अनुमान तो हर वर्ष शहर पलायन करने वाले लोगों की संख्या 50 लाख के आसपास बताते हैं। रघुराम राजन ने जब रिजर्व बैंक के गवर्नर का पद संभाला था तो उन्होंने भी कुछ इसी तरह की भावना व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि भारत में असली प्रगति तब होगी जब हम लोगों को कृषि से बाहर निकालकर शहरों में लाने में सफल होंगे। वह ऐसा कहने वाले अकेले अर्थशास्त्री नहीं हैं। अधिकांश मुख्यधारा के अर्थशास्त्री भी कई दशकों से इसी तरह के विचार व्यक्त करते रहे हैं। यह इन्हीं विचारों का नतीजा है कि सरकारी नीतियों में कृषि की अनदेखी की जाती है। कृषि भारत के आर्थिक राडार से गायब ही हो गई है। जब 70 प्रतिशत किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है और चालीस प्रतिशत से अधिक किसान मनरेगा जॉब कार्ड धारक हैं तब यह अपने आप साफ हो जाता है कि पिछले कुछ वषरें में खेती-किसानी किस तरह घाटे का सौदा बनकर रह गई है। सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार पांच लोगों का एक सामान्य परिवार फसल के उत्पादन से 3078 रुपये प्रति माह कमाता है और 765 रुपये उसे डेयरी से मिल जाते हैं। अगर इसमें 2069 रुपये प्रतिमाह मजदूरी अथवा सेलरी के तथा 514 रुपये गैर कृषि गतिविधियों के जोड़ दिए जाएं तो एक घर की कुल मासिक आय 6426 रुपये हो जाती है। दूसरे शब्दों में फसल उत्पादन तथा अन्य संबंधित कायरें से एक परिवार को 3843 रुपये मासिक प्राप्त होते हैं। इसका मतलब है कि एक कृषक परिवार के घर में आमदनी का केवल 60 प्रतिशत हिस्सा कृषि से आता है। यदि हरित क्त्रांति के 45 वर्ष बाद एक किसान के नसीब में मात्र इतना ही पैसा आता है तो क्या यह राष्ट्रीय शर्म का विषय नहीं है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि तकनीकी विकास के नाम पर अंधाधुंध तरीके से झोंकी गई गहन कृषि तकनीकें किसानों के जीवन में खुशहाली लाने में नाकाम साबित हुई हैं? वैसे तो एनएसएसओ हमें यह बताता है कि 15.61 करोड़ ग्रामीण घरों में 57 प्रतिशत घर कृषि से जुड़े हुए हैं। इसका मतलब है कि इन परिवारों में कम से कम एक सदस्य या तो कृषि कर रहा है अथवा पशुपालन से जुड़ा हुआ है। लेकिन सच्चाई क्या है? सच्चाई यह है कि खेती से संबंधित ये परिवार भी निरंतर उपेक्षा तथा संवेदनहीनता के शिकार हो रहे हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि के लिए कुल बजट आवंटन एक लाख करोड़ रुपये था। 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत अगले पांच सालों में बजट आवंटन बढ़कर डेढ़ लाख करोड़ रुपये हो गया। इस वर्ष यानी 2014-15 में 58 प्रतिशत आबादी को रोजगार उपलब्ध कराने वाली कृषि को केवल 24000 करोड़ मिले। दूसरी ओर इस वर्ष उद्योग सेक्टर को 5.73 लाख करोड़ रुपये की केवल कर छूट प्राप्त हुई। और भी विचित्र यह है कि मनरेगा तक को कृषि की तुलना में अधिक बजटीय आवंटन मिला। जब कृषि को जानबूझकर सरकारी फंडिंग से दूर कर दिया गया है तो इसके गंभीर चिंताजनक नतीजे होने ही थे। राहत की एकमात्र बात किसानों को दिया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी है। इसमें भी यह गौर करने लायक है कि पिछले तीन वषरें में गेहूं और चावल के समर्थन मूल्य में प्रति वर्ष केवल 50 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है। यह देश में इन चीजों की बढ़ती महंगाई के अनुरूप भी नहीं है। किसानों को सहारा देने के बजाय ऐसे हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं जिससे सरकारी खरीद की प्रक्त्रिया ही समाप्त हो जाए। इसके तहत एमएसपी को खत्म करने के सुझाव दिए जा रहे हैं। इसका मतलब होगा किसानों को बाजार की मनमानी के हवाले कर देना। लागत और मूल्य आयोग खुद ही एमएसपी को समाप्त करने की मांग कर रहा है ताकि बाजार ही यह तय कर सके कि किसानों को उनकी उपज की क्या कीमत मिलनी चाहिए? इस तरह के सुझाव देते हुए यह नहीं बताया जा रहा है कि केवल आठ प्रतिशत किसानों को ही एमएसपी का लाभ होता है और हर लिहाज से 92 प्रतिशत किसान उस निजी व्यापार पर निर्भर बने रहते हैं जो उनका शोषण करता रहा है। पंजाब के किसानों को एक सुनिश्चित एमएसपी हर वर्ष मिलता है, जबकि बिहार के किसान इससे वंचित रहते हैं। अगर एमएसपी समाप्त कर दिया जाता है तो पंजाब के किसान भी बिहार जैसे हालात से गुजरने के लिए विवश होंगे। खाद्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों को यह जो निर्देश दिया है कि वे केंद्र द्वारा घोषित एमएसपी के ऊपर किसानों को कोई बोनस न दें वह इसी दिशा में उठाया गया एक कदम है।

by Santosh Arya



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via Bhavik Barai

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